हीलीयोस्फीयर , Heliosphere in hindi - hindivigyan

हीलीयोस्फीयर क्या है ? Heliosphere in hindi

हीलीयोस्फीयर हमारे सौरमंडल का वह भाग है जो सूर्य द्वारा निर्मित है । हीलीयोस्फीयर सूर्य के द्वारा उत्सर्जित ऊर्जा के कारण बना एक विशालकाय बुलबुला है । इसके सौर पवन द्वारा बाहरी अंतरिक्ष के अवयव को बाहर निकाल दिया जाता है । 

यानी इसके अंदर सौर पवन से ज्यादा शक्तिशाली बाहरी अवयव ही प्रवेश कर सकते हैं । सौर पवन कोई हवा नहीं होती है बल्कि हम एक तरह से यह कह सकते हैं कि जैसे पानी में पड़ी गंदगी में साबुन डालने एक गोले नुमा आकृति में वह गन्दगी हट जाती है , ठीक उसी तरह सूर्य से निकलने वाले शक्तिशाली फोटॉन के कारण सौर मंडल के बाहर से आने वाला सभी विकिरण सौरमंडल से बाहर धकेल दिया जाता है , और सौरमंडल में एक सुरक्षा कवच की तरह बने बुलबुले की आकृति हीलीयोस्फीयर कहलाती है । 
 
हालांकि हीलीयोस्फीयर में किसी तारे के बाहरी परत या सतह से निकलने वाली ऊर्जा यानी इलेक्ट्रान और प्रोटोन होती है, और इससे निकलने वाले इन इलेक्ट्रॉनों और प्रोटॉनों की ऊर्जा से ज्यादा शक्तिशाली पदार्थ ही सौरमंडल में प्रवेश कर सकते हैं । 

फोटोन, इलेक्ट्रान और प्रोटोन किसी तारे की गुरुत्वाकर्षण शक्ति से बाहर निकलने में समर्थ होते हैं फिर वह चाहे सूर्य से करोड़ों गुना बड़े तारे यू वाई स्कूटी ही क्यों न हो । 

सूर्य ही नहीं अपितु हर तारा अपने अंदर से इलेक्ट्रान और प्रोटोन को निकालता रहता है । सूर्य नाम के कारण इसे सौर पवन और सौरमंडल से बाहरी तारों से निकलने वाले इन विकिरणों को ब्रह्मांड पवन कहते हैं ।
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सूर्य से निकलने वाले ये इलेक्ट्रॉन तथा प्रोटोन की आवृत्ति एक निश्चित दूरी के बाद कमजोर होने लगती है । हमारे सौरमंडल के आखिरी चरण अर्थात यम ( प्लूटो ) तक पहुंचते-पहुंचते यह विकिरण कमजोर होने लगते हैं और इसके बाद यह समाप्त हो जाते हैं । 

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि मुक्त रूप से ब्रह्मांड में विचरण करता हुआ डार्क मैटर तथा खगोलीय माध्यम उसकी आवृत्ति को लगातार कम कर देता है यम से काफी आगे जाकर यह पूर्ण रूप से अथवा ना के बराबर अस्तित्व में बचते हैं । 

खगोलीय माध्यम हिलियम और हाइड्रोजन से बना हुआ है जो अदृश्य रूप से ब्रह्मांड में हर जगह उपस्थित होता है । हीलीयोस्फीयर को मूल रूप से 4 भागों में बांटा गया है । 
  1. टर्मिनेशन शॉक
  2. हेलियोशेथ
  3. हिलीयोपॉज
  4. बौ शॉक

1. टर्मिनेशन शॉक:

हीलीयोस्फीयर के शुरुआती भाग जहां इलेक्ट्रान और प्रोटोन की गति सुपरसोनिक से सब सोनिक यानी ध्वनि की गति से धीमी होने लगती हैं , उसे टर्मिनेशन शॉक या समापन झटका कहते हैं । 

अर्थात यह वह जगह है जहां पर सूर्य का प्रभाव सीमित हो जाता है । सूर्य से टर्मिनेशन शॉक की दूरी करीब 75 से 90 एस्टॉनोमिकल यूनिट है । किसी तारे की ज्वाला भी यह निर्धारित करती है कि उसका टर्मिनेशन शॉक कितना दूर होगा ।

सूर्य से निकलने वाली सौर वायु की गति 400 किलोमीटर प्रति सेकंड होती है परंतु टर्मिनेशन शॉक में यह गति घटकर 0.33 किमी प्रति सेकंड रह जाती है । 

हम उसे देख तो नहीं सकते पर ब्रह्मांड में खगोलीय दाब और अदृश्य ऊर्जा जिसका दबाव नाम मात्र होता है से होकर जब सौर वायु गुजरती है तब यह लगातार प्रबलता कम होती जाती है, या कहें तो खगोलिय माध्यम जिसका घनत्व अत्यंत कम होता है और उसपर कोई विशेष दबाव नही होता है ;वही सौर वायू का दबाव उसे उतपन्न करने वाले तारे की दूरी के वर्गमूल के अनुपात मे कम होती है। 

जैसे सौर वायु तारे से दूर जाती है एक विशेष दूरी पर खगोलिय माध्यम का दबाव सौर वायु के दबाव से ज्यादा हो जाता है और सौर वायु के कणो की गति को कम कर देता है और इससे एक शॉक उत्पन्न होता है जिसे टर्मिनेशन शॉक कहते हैं ।

2. हेलियोशेथ

टर्मिनेशन शॉक और हिलीयोपॉज के बीच का भाग हेलियोशेथ कहलाता है । करीब 80 से 100 एस्ट्रोनॉमिकल यूनिट पर स्थित यह भाग सौरमंडल का बेहद बाहरी हिस्सा है । नासा द्वारा छोड़े गए अंतरिक्ष यान वायेजर 1 और 2 इसी हिस्से में पहुँच चुके हैं और उस स्थान के बारे में डेटा इकट्ठा कर रहे हैं । 


3. हिलीयोपॉज

सौरमंडल के एकदम आखिरी हिस्से जहां पर सौर वायु का प्रभाव बिल्कुल भी नहीं होता उसे हिलीयोपॉज कहा जाता है । इस हिस्से में बाहरी अंतरिक्ष से आने वाले कणों को बाहर धकेलना बहुत ही कठिन होता है । ये वह हिस्सा हैं जहां से हीलीयोस्फीयर खत्म होता है । 

4. बौ शॉक

हीलीयोस्फीयर एक सुरक्षा कवच की तरह है जो सौरमंडल में घुसने वाले बाहरी विकिरण को और बाहरी अवयवों को सौरमंडल में नहीं घुसने देता । 
आकाशगंगा के केंद्र का सूर्य लगातार चक्कर लगा रहा है इस दौरान आकाशगंगा के केंद्र से आने वाले विकिरण तथा ऊर्जा को सौरमंडल के बाहर हीलीयोस्फीयर से टकराव होता है ।

इस टकराव से इस हिस्से में बहुत अधिक हलचल होती है जिसे बौ शॉक कहते हैं । यह हिस्सा सूर्य के द्वारा उत्पन्न किये गए ऊर्जा के पूरी तरह निष्क्रिय होने वाले स्थान पर स्थित है ।